Monday, December 30, 2013

हे रामचंद्र कह गये सिया से.............

21वीं सदीं चल रही हैं। माना जाता हैं कि 21वीं सदी भारत की हैं। इस सदी में भारत अपने शीर्ष पर होगा। कभी – कभी अच्छी खबरें अखबारों में पढ़ता हूं अथवा टीवी चैनलों के माध्यम से सुनता हूं तो लगता हैं कि सचमुच देश उसी ओर बढ़ रहा हैं, पर जब कभी ऐसी खबरों पर नजर जाती हैं, जिससे देश रसातल में जा रहा होता हैं तो हमें ही क्या, कई भारतीयों को निराशा हाथ लगती हैं कि क्या ऐसे में भारत आगे बढ़ेगा, या यूं ही ख्बाब, ख्बाब ही रह जायेंगे। इन दिनों भारतीय चैनलों और अखबारों में एक से एक बाबाओं और संतों की पोल खुल रही हैं। ऐसे लोगों की पोल खुलनी भी चाहिए। ताकि पता चल सकें कि इन ढोंगियों ने देश का कितना नुकसान किया हैं और वे अपनी लीलाओं से देश को किस प्रकार गर्त में ले जा रहे हैं, पर क्या इसका असर भारत की सामान्य जनता पर पड़ता हैं, या फिर वे वहीं करते हैं, जो उन्हें करना होता हैं। झूठी मन की शांति के लिए, वे ढोंगियों के आगे सर झूकाते हैं और स्वयं के साथ – साथ देश को भी गर्त में ले जाते हैं। हाल ही में एक फिल्म आयी ओह माई गॉड हमें लगा कि इस फिल्म का असर दीखेगा, पर फिल्म आयी और चली गयी। जैसे एक सामान्य बच्चा, स्कूल शिक्षक या अपने से बड़ों की अच्छी बातों को एक कान से सुनता है और दुसरी कान से निकाल देता हैं, वहीं बात यहां आमजन के साथ देखने को मिली। इस फिल्म में सभी धर्माचार्यों और पांखंडियों की पोल खोलकर रख दी गयी थी, चाहे वे किसी भी धर्म के क्यूं न हो, पर मजाल हैं कि हमारे देश के लोगों के कानों पर जूं रेंगी हो। शायद हमारे देश के लोगों के उपर सन् 1970 में बनी फिल्म गोपी का वो सुपरहिट गीत कुछ ज्यादा ही सर चढ़ कर बोल रहा हैं, जिसमें दिलीप कुमार पर्दे पर गा रहे होते हैं। गीत के बोल थे..................
सुनो सिया, कलयुग में काला धन और काले मन होंगे, काले मन होंगे।
चोर, उचक्के नगर सेठ और प्रभु भ्रक्त निर्धन होंगे, निर्धन होंगे।
जो होगा, लोभी और भोगी – 2
वो जोगी कहलायेगा
हंस चुगेगा, दाना तुनका, कौवा मोती खायेगा,
हे रामचंद्र कह गये सिया से...................
अगर इस गीत को ध्यान पूर्वक देखे तो साफ पता चलेगा कि इस गीत के एक – एक बोल आज सही हो रहे है। तथाकथित संतों की हरकते तो साफ बता रही हैं कि वे इस गीत को अक्षरशः सिद्ध करने में ऐड़ी चोटी एक किये हुए हैं। कौन तथाकथित संत कितना धन इक्टठा कर रहा हैं, इसकी अँधी दौड़ चल रही हैं, वे एक दूसरे को पटखनी देने में लगे हैं और यहां की जनता, अँधभक्ति और झूठी सुख शांति के लिए, इनके धनलोलुपता को और बढा रही हैं। कोई तथाकथित संत कृपा लूटा रहा हैं, तो कोई सपने में सोना का खान ढूंढ रहा हैं तो कोई स्वयं गुरु बन कर अपने चेलों को ये कह रहा हैं कि हमारे लिए तुम धरना प्रदर्शन करों ताकि हम जेल से छूट जाये, कोई व्यभिचार में फंस रहा हैं तो कोई मुक्तकंठ से अपने व्यापार को आगे बढ़ाने में लगा हैं। भला संतों का यहीं काम हैं क्या।
तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस को देखिए, अरण्यकांड में श्रीराम और नारद संवाद हैं। जिसमें नारदजी को श्रीराम कहते हैं कि संतो के लक्षण क्या हैं, कैसे आप संत को पहचानेंगे, संत की परिभाषा क्या हैं, किस प्रकार का संत उन्हें अत्यधिक प्रिय हैं, इस मर्म को तुलसीदास ने बड़े ही सरल चौपाई में लिख डाला हैं, बस थोड़ा सा दिमाग लगाईये, आपको भावार्थ समझने में देर नहीं लगेगी, साथ ही अपने मन में सोचिये कि क्या इनमें से एक भी भाव अथवा लक्षण भारत के इन तथाकथित संतों में दिखाई पड़ते हैं।
षट विकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।।
अमित बोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।।
सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।
गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुं देह न गेह।।
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं। पर गुन सुनत अधिक हरषाहीं।।
सम सीतल नहिं त्यागहिं नीती। सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती।।
जप तप ब्रत दम संजम नेमा। गुरु गोबिंद बिप्र पद प्रेमा।।
श्रद्धा छमा मयत्री दाया। मुदिता मम पद प्रीति अमाया।।
बिरति बिबेक बिनय बिग्याना। बोध जथारथ बेद पुराना।।
दंभ मान मद करहिं न काऊ। भूलि न देहि कुमारग पाऊ।।
गावहिं सुनहिं सदा मम लीला। हेतु रहित परहित रत सीला।।
मुनि सुनु साधुन्ह के गुन जेते। कहि न सकहिं सारद श्रुति तेते।।
जो आजकल टीवी चैनलों पर हर सुबह शाम दीख जाते हैं, या जिनको लेकर हाय तौबा मचायी जा रही हैं, या जिन संतों ने बेड़ागर्क कर रखा हैं, इनमें से ज्यादा संत तो टीवी ब्रांड हैं, जिन्हें समय समय पर टीवी चैनलों ने इन्हें अपने फायदे के लिए जनता के समक्ष रखा हैं, और बाद में जब इन तथाकथित संतों की निकल पड़ी तो इन्होंने टीवी चैनलों को आंख दिखाना शुरु कर दिया, और फिर जब बात बन गयी तो लीजिए, कुछेक संत फिर से टीवी पर दिखाई पड़ने लगे, जिनकी कभी चैनलों ने खिचाई की थी। गोस्वामी तुलसीदासकृत श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड का एक प्रसंग। हनुमान सीता की खोज में लंका पहुंच गये। अचानक उन्हें एक घर से राम – राम की संकीर्तन सुनाई पड़ती हैं। वे आश्चर्य में पड़ते हैं कि लंका में तो निशिचर रहते हैं, यहां सज्जनों का निवास कैसे। पता लगाने के लिए, हनुमान अपना वेष बदलते हैं। पता लगता हैं कि ये तो राम भक्त विभीषण का निवास स्थान हैं। जैसे ही विभीषण की रामभक्ति देखते हैं। हनुमान अपने मूलस्वरुप में आ जाते हैं और अचानक विभीषण जी के मुख से ये बाते निकल पड़ती हैं कि
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहि नहिं संता।।
हे हनुमान जी अब हमें पक्का भरोसा हो गया कि बिना ईश्वरीय कृपा के संत नहीं मिलते। आज हमारे उपर ईश्वरीय कृपा हो गयी। अब जरा बताईये। हनुमान जी की तुलना, बिभीषण संत से कर रहे हैं। क्या हनुमान जी के संत होने पर किसी को संदेह हो सकता हैं। उत्तर होगा – कदापि नहीं। क्योंकि संतों के सारे गुण, सारे लक्षण हनुमानजी में भरें पड़े हैं। संत कैसा होना चाहिए, इसका सुंदर उदाहरण तो हनुमान जी हैं, पर आज के संतों को देख लीजिए। उनमें हनुमानजी का एक भी गुण अथवा लक्षण दिखाई देता हैं, नहीं तो फिर इस प्रकार की नौटंकी क्यों। हमारे यहां संतों की एक परंपरा रही हैं। विशाल परंपरा। न धन की लालच और न पद की महत्वाकांक्षा। सभी का कल्याण हो, एकमात्र यहीं भाव। उठा लीजिये, गुरुनानक, रविदास, समर्थगुरुरामदास, मीराबाई, सुरदास, रसखान, ज्ञानेश्वर जैसे सैकड़ों, हजारों संतों को। इन संतों ने अपने जीवनकाल में अपने लिए क्या किया और समाज के लिए क्या किया। हम ज्यादा दूर नहीं जाना चाहते। एक सवाल पूछना चाहता हूं। देश में एक राजनीतिक संत हुए – महात्मा गांधी। मोहनदास से महात्मा कैसे हो गये। अपने लिए उन्होंने कितने घर बनाये अथवा स्वयं को महिमामंडित करने के लिए कितने आश्रम खोले। उत्तर होगा – नहीं। तो फिर एक छोटी सी बात लोगों के दिलों में क्यूं नहीं समझ आती।
भारत का ध्येयवाक्य हैं –
सत्यमेव जयते।
भारत का प्राण बसता हैं –
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद दुख भागभवेत।।
हमें नही लगता कि इससे अधिक की जानकारी की आवश्यकता हैं। संत चरित्र निर्माण करता हैं। संत व्यक्तित्व निर्माण करता हैं। संत समाज व देश का निर्माण करता हैं। संत समस्याओं का समाधान कर देता हैं। संत खुद ही समस्या नही बन जाता, जो संत समस्या बन जाये, वो खुद एक भयानक रोग के समान हो जाता हैं, जिससे देश और समाज को नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिलता। फिलहाल मेरे देश में कुछ संतों को छोड़ दिया जाय तो ज्यादातर इस देश में ऐसे तथाकथित संत हो गये, जो चैनलों व कुछ अखबारों की आड़ में स्वहित देखते हुए, देश को दीमक की तरह चाट रहे हैं। पर वे भूले नहीं, कि अंततः सत्य की विजय होती हैं, वे कितना भी धूर्त क्यों न बन जाये। देश उन्हें अपने ढंग से सजा अवश्य दे देगा।

Sunday, December 29, 2013

दिल्ली के रामलीला मैदान में राम हंस रहे थे........

याद करिये त्रेतायुग। इस त्रेतायुग में एक भारत का लाल जन्मा था। नाम था - राम। उसने ऐसी आदर्श व्यवस्था कायम की,  ऐसी मर्यादाएं उकेरी कि वो राम से मर्यादा पुरुषोत्तम राम हो गये। राम की एक छोटी कहानी सुनाता हूं, शायद आपको अच्छा लगे। राम की तीन माताएं थी। तीनों माताओं में से जन्म देनेवाली मां कौशल्या से भी अधिक स्नेह कैकेयी राम से किया करती थी, पर कैकेयी ने ही जब राम को राज्याभिषेक करने की तैयारी चल रही थी तो राम के लिए बाधाएं बन कर खड़ी हो गयी और महाराज दशरथ से राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांग लिया। राम वनवास जाने को तैयार हो गये। यहीं नहीं उनके साथ उनकी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण भी वन जाने को तैयार हो गये। पर अवध नरेश महाराज दशरथ इसके लिए तैयार नहीं थे, वे बार - बार राम को अपने पिता से द्रोह करने की विनती करते हैं, फिर भी देश काल और समाज के कल्याण के लिए राम वन गमन को तैयार हो गये। सारी अयोध्या राम के साथ वन जाने को तैयार हैं, पर राम अपने सत्य मार्ग से विचलित होने को तैयार नहीं, वे अयोध्या, अयोघ्या की राजगद्दी, अयोध्या की जनता को छोड़ने को तैयार हैं पर सत्य और धर्म को छोड़ने को तैयार नहीं। 
जिस कांग्रेस पार्टी को आम आदमी पार्टी और अन्य पार्टियां गाली दे रही हैं। उसमें भी एक महिला नेत्री हैं - सोनिया गांधी। विदेश में जन्मी, पर भारतीय संस्कृति के मूल भाव त्याग को इस प्रकार अपनायी कि वह दस वर्षों से सत्ता में हैं, पर प्रधानमंत्री पद का लालच उन्हें डिगा नहीं सका। याद करिये संसद के सेन्टर हाल में उनके दल के सारे नेता, दिल्ली की जनता उनके दरवाजे पर खड़ी थी, बार - बार अनुरोध कर रही थी, मैडम आप प्रधानमंत्री बन जाइये, पर वो प्रधानमंत्री नहीं बनी और न ही राहुल को सत्ता के केन्द्र बिन्दु में रहने के बावजूद कोई महत्वपूर्ण विभाग दिलवाया। 
हां एक और बात। देश में एक महात्मा हुए, जो मोहनदास से महात्मा गांधी बन गये, क्या वो चाहते तो भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे, पर वो नहीं बने, जवाहर लाल को बनाया। शायद वो जानते थे कि जो सब कुछ बन जाता हैं, वो कुछ नहीं बनता और जो कुछ भी नहीं बनता वो बहुत कुछ बन जाता हैं, जैसे कि मोहनदास, महात्मा और राष्ट्रपिता बन गये। ऐसै भी जब देश की सेवा करनी हैं तो इसमें पद क्या हैं? आप कहीं भी रहकर वो काम कर सकते हैं, जिससे देश खिल उठे। उदाहरण  तो अन्ना हजारे भी हैं, जिन्होंने अपने अनशन से पूरे सदन का ध्यान अपने आंदोलन की ओर खींचा और आज उनके प्रयास से देश में जनलोकपाल विधेयक सामने हैं।
आप पूछेंगे कि ये सब लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ गयी। कल सुबह सुबह उठा। चैनल खोला। तो पता चला कि देश की राजधानी दिल्ली में सरकार बनने- बनाने का बवडंर थमने जा रहा है। आम आदमी पार्टी जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी हैं, कांग्रेस के खिलाफ लड़ी हैं, वो कांग्रेस के साथ ही सत्ता प्राप्त कर रही हैं। अरविन्द केजरीवाल मुख्यमंत्री बन रहे हैं, और देखते ही देखते अरविंद अपने छह साथियों के साथ दिल्ली की सत्ता संभाल ली। खूब भाषण दिये। गाना गाया। श्रीमद्भागवद्गीता के रहस्यों की विवेचना की। लगा कि बस अब राम राज्य आ ही गया।  पर क्या जो अनैतिक तरीके से सत्ता प्राप्त करता हैं, वो क्या सत्य मार्ग को प्रशस्त कर सकता है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा सकता हैं, उत्तर होगा- नहीं।
कुछ सवालों के जवाब क्या अरविंद दे सकते हैं...................
क. जिसके खिलाफ आप चुनाव लड़े और उसी के साथ मिलकर आप सरकार बनाये, क्या ये भ्रष्टाचार नहीं हैं?
ख. आप कहेंगे कि आपने जनता से राय मांगी और जनता ने राय दिया, तब सरकार आपने बनायी, तो फिर सवाल आप से ही कि उसी जनता ने आपको स्पष्ट जनादेश क्यों नहीं उस वक्त दे दिया, जब चुनाव हुए थे?
ग. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद, जनता से यह कहना कि जब आप कोई सरकारी विभाग में काम कराने जाओ और कोई घूस मांगे तो घबराओं नहीं, इनसे कैसे सलटना हैं, हम सलट लेंगे,  क्या ये मुख्यमंत्री की भाषा हो सकती है?
घ. लोकतंत्र में एक बड़ी पार्टी को सत्ता से हटाकर, दूसरे नंबर और तीसरे नंबर की पार्टी मिलकर सरकार बनाये और कहे कि हमें जनादेश मिला हैं, इससे बड़ा भ्रष्टाचार और क्या हो सकता हैं?
ड. पिछले कई दिनों से अरविंद के भाषण सुन रहा हूं, जो आदमी अपने ही दिये गये भाषणों और वक्तव्यों पर कायम नहीं रहे, उस पर हम ये कैसे विश्वास करें कि वो अच्छा करेगा? जैसा कि अरविंद ने दिल्ली चुनाव परिणाम आने के पहले कहा था कि हम न भाजपा और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनायेंगे और न ही सरकार को सहयोग देंगे और अब कांग्रेस के साथ मिलकर सत्ता हथिया ली। ये तो भ्रष्टाचार का रिकार्ड तोड़ेनेवाला कीर्तिमान हैं। आप कहेंगे कि जनता से राय लिया तब सरकार बनायी। अरविंद जी, यहीं जनता राम को भी वनवास न जाने के लिए अनुरोध किया था पर राम ने जनता के उस अनुरोध को अस्वीकार करते हुए, अपने वचनों पर कायम रहे। अरे सोनिया को तो जनता ने जनादेश तक दे दिया पर सोनिया ने प्रधानमंत्री की पद ठुकरा दी। आप तो सोनिया की पार्टी कांग्रेस से भी गये गुजरे हो।
उपनिषद् कहता हैं ----------------
जो अच्छे लोग हैं वे मन, वचन ओर कर्म से एक होते हैं
जबकि दुर्जन, मन, वचन और कर्म इन तीनों से अलग होते हैं।
अब आप बताओ केजरीवाल कि आपने दिल्ली चुनाव परिणाम आने के पहले कहा कुछ और चुनाव परिणाम आने के बाद किया कुछ ये क्या बताता हैं, सज्जनता या दुर्जनता? चलो एक बात के लिए आपको बधाई तुम्हारा बेटा आज ये कहने के लायक हो गया कि मेरा पापा दिल्ली का मुख्यमंत्री हैं, पत्नी कहेगी कि मेरा पति दिल्ली का मुख्यमंत्री हैं। दिल्ली की जनता कहेंगी कि दिल्ली का मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हैं। पर जिन्हें राजनीति में आदर्श और शुचिता स्थापित करनी हैं या देश को एक बेहतर राजनीतिक स्थिति में ले जाना चाहते हैं, उन्हें तुम्हारी सत्ता स्थापित होने से कोई फर्क नहीं पड़ा हैं। 
हां एक बात हैं, आप कुछ ऐसा करों कि जिससे लगे कि आपने कुछ किया। अभी तक तो आप बोलते ही रहे हो। और वो बोले जो किये ही नहीं, अथवा वचन पर कायम नहीं रहे। ऐसे में आपसे आशा भी रखना, मूर्खता को सिद्ध करने के बराबर हैं। हां एक बात और, अभी सारे के सारे चैनल और दूसरे मीडिया हाउस आपकी चरणवंदना में लगे हैं, पर ये कब तक आपके साथ रहेंगे, वो आपको भी मालूम होना चाहिए, क्योंकि ये किसी के नहीं हैं, कब पलटी मारेंगे और फिर आप कहां दीखेंगे, कुछ कहा नहीं जा सकता। शायद यहीं कारण था कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जब अरविंद लीलाएं कर रहे थे, भगवान राम आकाश से उन लीलाओं को देख हंस रहे थे............

Wednesday, December 18, 2013

आप वाले संभलिये - कहीं चौबे गये छब्बे बनने वाली कहावत न चरितार्थ हो जाये आपके साथ.....

 
अपने देश में एक पार्टी की चर्चा है – आम आदमी पार्टी की। अखबार हो या टीवी। सभी पर ये ही विराजमान हैं, जैसे लगता हैं कि अब देश में गर कोई ईमानदार पार्टी हैं तो बस सिर्फ आम आदमी पार्टी। पर जिस देश में चरित्र कौड़ियों के भाव बिकता हो, वहां एक पार्टी इतनी चरित्रवान कैसे हो सकती हैं। समझा जा सकता हैं। फिर भी मीडिया जो न करायें। अभी देश की मीडिया आम आदमी पार्टी को सरताज बनाने में लगी हैं। ये वही मीडिया हैं जो पैसे लेकर कभी निर्मल बाबा तो कभी आसाराम बापू को एक नंबर संत बनाने का काम की थी, जिसका खामियाजा आज पूरा देश भुगत रहा हैं। हालांकि मीडिया का एक चरित्र तरुण तेजपाल के रुप में सारे देश के सामने है, कि इस मीडिया में कैसे – कैसे लोग आकर देश का सर्वनाश कर रहे हैं।
जब से दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ और उसके परिणाम आये। जिसे देखो – बस आम आदमी पार्टी के गुणगान में लगा है। इस गुणगान को देख आम आदमी पार्टी से जूड़े लोग भी अतिप्रसन्नता के शिकार हैं और वे वो कार्य कर रहे है, जिसकी इजाजत एक सभ्य समाज नहीं दे सकता हैं। वे एक स्वर से देश में कार्यरत विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को गालियां दे रहे हैं, जैसे लगता है कि दुनिया की सारी खुबसुरती इन्हीं की पार्टी में समा चुकी हैं और बाकी पार्टियां और उसमें शामिल नेता निर्ल्लज है।
जबकि सच्चाई ये हैं कि बारीकी से अध्ययन किया जाय तो आम आदमी पार्टी में भी वे सारे दुर्गुण मिल जायेंगे, जिसकी शिकार अन्य पार्टियां भी हैं, और इसके उदाहरण एक नहीं अनेक हैं ----
क.   आम आदमी पार्टी के ही एक नेता हैं – योगेन्द्र यादव। कल तक कांग्रेस भक्त हुआ करते थे. और कांग्रेस भक्ति में लीन होने के कारण कांग्रेस के नेताओं ने इन्हें कई जगहों पर कृपा भी लूटाई। हाल तक एक देश के एक बड़े आयोग के एक बड़े पदाधिकारी थे और अब कांग्रेस को उपदेश दे रहे हैं।
ख.  चुनाव के दौरान ही आप का एक नेता, जो स्वयं को कवि भी   बताता हैं, भारतीय सम्मान पद्मश्री की धज्जियां उड़ा रहा था, साथ ही दिल्ली स्टाईल में सभी को गालियां दे रहा था – चुनावी सभा के दौरान वो कहते हैं न बाबाजी की............। क्या ये भाषा शराफत में विश्वास रखनेवाले किसी पार्टी की हो सकती हैं।
ग.   आम आदमी पार्टी के लिए काम कर रहा एक संगीत दल – दूसरी पार्टियों को कमीना बता रहा था और इस संगीत दल के कार्यक्रम में आनन्द ले रहे थे – आम आदमी पार्टी के बड़े बडे नेता। आम आदमी पार्टी के नेता बताये कि वे कमीना शब्द का प्रयोग किसके लिए कर रहे थे।
घ.    आम आदमी पार्टी के ही एक नेता हैं – प्रशांत भूषण जो कश्मीर को भारत का अंग नहीं मानते। जिसे लेकर एक सिरफिरे ने उन्हीं के कार्यालय में जाकर, उनके साथ अभद्र व्यवहार किया था। क्या कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं।
ङ.     स्वयं को बेहतर और दूसरे को निर्लज्ज बताने का जो जज्बा तैयार किया हैं आम आदमी पार्टी ने क्या उसे मालूम नहीं कि उसी के एक पार्टी के विधायक पर लड़की के साथ छेड़छाड़ करने का आरोप भी हैं, पर ये कहेंगे कि विरोधियों ने उन्हें बदनाम करने के लिए ऐसा किया हैं।
च.   ज्यादातर आम आदमी पार्टी के नेता व कार्यकर्ता करोड़पति हैं – ऐसे मैं ये आम आदमी की पार्टी कैसे हो गयी।
अन्ना के आंदोलन में शामिल होना और तिरंगे लहराना और फिर उसी आंदोलन का फायदा उठाकर एक राजनीतिक दल बनाकर अन्य सारे राजनीतिक दलों को गाली देना – किस किताब में लिखा हैं। गर इतना ही शौक था तो ये खुद पांव घिसते,  आंदोलन करते और फिर पार्टी बनाते। अन्ना के आँदोलन को हाईजैक कर पार्टी बनानेवाले, शायद नहीं जानते कि जो जनता 28 दे सकती हैं तो दो पर लटका भी सकती हैं। अभी तो 28 सीट क्या मिला ये पागल हो गये हैं। वो कहते हैं न रामचरितमानस की चौपाई में लिखा हैं --------
छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई।
जस थोरेहुं धन खल इतराई।।
साथ ही आम आदमी पार्टी के नेताओं के व्यंग्य बाण या यो कहें निर्लज्जता वाले बयान जिस प्रकार से अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं पर पड़ रहे हैं, उससे साफ लगता हैं कि हालात हैं-----
बूंद अघात सहहिं गिरि कैसे।
खल के वचन संत सह जैसें।।
कहने का तात्पर्य हैं कि हर व्यक्ति अथवा हर राजनीतिक दल को मर्यादा में रहनी चाहिए, गर आप मर्यादा तोड़ेंगे तो जनता आपको भी औकात दिखा देगी। चाहे आप कितने ही बड़े मीडिया मैनेजमेंट क्यों न कर रखे हो। आम आदमी पार्टी को मालूम होना चाहिए कि जूता कितना भी कीमती हो, वह पांव में ही पहना जाता हैं। ठीक उसी प्रकार झाडूं सिर्फ दूसरों पर नहीं चलती, बल्कि कभी – कभी अपने घरों में भी चलानी पड़ती हैं, नहीं तो घर में गदंगी अधिक होने पर, घर में रह रहे लोग बीमारी के शिकार हो सकते हैं। मैं तो देख रहा था कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता मस्ती में इतने पागल हो गये है कि वे झाडूं को टोपी बनाकर पहन रहे हैं। ऐसे उनकी मर्जी कि वे झाडूं को टोपी बनाकर पहने अथवा झाडूं को झाडूं रहने दे। हमें इससे क्या। पर इतना जरुर कह देना चाहता हूं कि ज्यादा इतराये नहीं। वो जो सोच रहे हैं कि कांग्रेस आठ सीटों पर जाकर थम गयी या भाजपा 32 पर आकर अटक गयी तो ये उनकी बड़ी भूल हैं। राजनीति में तो ये सब चलता ही रहता हैं। पर राजनीति में अहंकार नहीं चलता। आप को अहंकार ही ले डूबेगा। ये जो सोच रहे है कि दिल्ली में फिर विधानसभा चुनाव होगा तो वे बहुमत में आ जायेंगे। मूर्खता के सिवा कुछ भी नहीं। क्योंकि भारत में एक मुहावरा हैं – चौबे गये छब्बे बनने, दूबे बनकर आये। क्योंकि अगले चुनाव में क्या होगा, मुददे क्या होंगे। कोई नहीं जानता। ऐसा नहीं कि शीला दीक्षित इस बार हार गयी तो दुबारा भी हार जायेंगी। शीला दीक्षित के हार के कई दूसरे कारण है और भाजपा के बहुमत नहीं मिलने के दूसरे कारण पर आप के जीत के कोई कारण नहीं हैं, ये तो मीडिया मैनेंजमेंट हैं, और योगेन्द्र यादव इसके माहिर खिलाड़ी। पर ये माहिर खिलाड़ी हमेशा जीतते ही रहेंगे और आप पार्टी को जीतवाते ही रहेंगे। ऐसा नहीं हैं।