Tuesday, November 29, 2016

ये कॉलेज हॉस्टल है या गुंडों का अभयारण्य............

आज का अखबार मेरे सामने है। अखबार पढ़ने से पता चल रहा है कि दुमका के एसपी कॉलेज के हॉस्टल में छापेमारी के दौरान तलवार, रॉड, बोतलें, सीडी व अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद हुए है। छह आधुनिक ब्रांड ( आधुनिक ब्रांड शब्द का इस्तेमाल इसलिये कर रहा हूं कि पहले छात्र समाज व देशहित में कार्य करते थे पर आज स्वहित में अपने जेबखर्च और अश्लील साहित्यों को पढ़ने के उददेश्य से सारी हरकतों को अंजाम देते है। ) के छात्र हिरासत में लिये गये है। यहीं नहीं, करीब छह घंटे तक चली कार्रवाई में हॉस्टल के आसपास की झाड़ियों से भारी मात्रा में परंपरागत हथियार व आपत्तिजनक सामान जब्त किये गये। जो सामान बरामद हुए है, वे है – 20 से 25 हजार तीर, धनुष सहित तलवार, लोहे के रड, लाठी-डंडे, शराब की बोतलें, अश्लील सीडी और अन्य आपत्तिजनक सामान। इन सामानों की बरामदगी के बाद हॉस्टल को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का आदेश दे दिया गया है। हम आपको बता दें कि ये छापामारी भी नहीं होती, अगर 25 नवम्बर को सीएनटी-एसपीटी के सरलीकरण के खिलाफ झारखण्ड बंद का आयोजन नहीं होता। दरअसल हुआ ये कि 25 नवम्बर को झारखण्ड बंद के दौरान दुमका में संताल परगना कॉलेज के सामने हुई आगजनी की घटना के बाद प्रशासन ने कल सोमवार को हॉस्टलों में छापे मारे, क्योंकि 25 नवम्बर को झारखण्ड बंद के दौरान दुमका के एसपी कॉलेज के पास भीड़ हिंसक हो गयी थी। उस दिन आठ गाड़ियों को फूंक डाला गया था, 50 से अधिक वाहनों में तोड़-फोड़ की गयी थी। इस मामले में तीन प्राथमिकियां दर्ज की गयी है, जबकि 1200 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है।
हमारा कॉलेज प्रशासन से कुछ सवाल...
क. क्या कॉलेज प्रबंधन द्वारा, अपने हॉस्टल में रह रहे छात्रों को तीर-तलवार चलाने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है? अगर नहीं तो फिर इतनी बड़ी संख्या में तीर-धनुष, तलवार, लोहे के रड कहां से आ गये?
ख. छापेमारी के दौरान अश्लील साहित्य व सीडी भी बरामद हुए, क्या कॉलेज प्रशासन बता सकता है कि अश्लील साहित्यों की खेप हॉस्टलों में कैसे आ गयी?
ग. कॉलेज हॉस्टलों में रह रहे छात्र क्या कर रहे है?, उनकी गतिविधियां असामाजिक है अथवा नहीं? इसकी जिम्मेवारी कॉलेज हॉस्टल प्रबंधन की नहीं होती क्या?
जब कॉलेज हॉस्टलों में ऐसी नारकीय स्थिति है, तो फिर ऐसे कॉलेज रहे या नहीं रहे, क्या फर्क पड़ता है?
दुमका प्रशासन ने एसपी कॉलेज के हॉस्टलों में छापेमारी कर, जो चीजें बरामद की, और जो छात्रों की हरकतें सामने आयी है, वह देश और समाज दोनों के लिए खतरा है? इस कॉलेज हॉस्टल में रह रहे छात्रों के अभिभावक भी ध्यान दें, देखे कि उनके बच्चे यहां हॉस्टल में रहकर क्या कर रहे है?, अगर अभी नहीं चेते तो उनके बच्चे हाथ से निकल जायेंगे और फिर जो उनके सपने है, वे तो अंधकारमय हो ही रहे है, इस राज्य और देश को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, अभी समय है, चेत जाये तो अच्छा।
हम राज्य सरकार से भी अनुरोध करेंगे, कि ऐसे जितने भी कॉलेज है और जहां हॉस्टल संचालित है, वहां समय – समय पर इस प्रकार की जांच/छापेमारी अवश्य कराएं ताकि बच्चों में भय रहे कि उनके उपर सरकार और विभागीय अधिकारी है, जो कभी भी जांच कर सकतें है और जांच क्रम में पता चले कि ये असामाजिक कृत्यों में लिप्त है, तो उन पर कठोर कार्रवाई भी करें, ताकि देश और समाज को आसन्न संकटों से बचाया जा सकें...

Thursday, November 24, 2016

ये माननीय नहीं हो सकते.............

ये माननीय नहीं हो सकते...
जो स्पीकर पर कुर्सियां फेकें...
जो स्पीकर पर जूते फेकें...
जो स्पीकर पर फॉगिंग स्प्रे करें...
जो रिपोर्टिंग टेबल पर आ धमकें...
जो मार्शल के साथ धक्का-मुक्की करें...
जो संसदीय कार्य मंत्री से कार्य सूची लूट कर फाड़ डालें...
जो झारखण्ड की भोली-भाली जनता के सम्मान की धज्जियां उड़ाएं...
वे माननीय नहीं हो सकते...
वे सिर्फ और सिर्फ गुंडे होते है...
कल झारखण्ड विधानसभा में जो कुछ हुआ, वह झारखण्ड की सवा तीन करोड़ जनता का अपमान है...
यह भारतीय लोकतंत्र का अपमान है...
इन जनप्रतिनिधियों को ये नहीं भूलना चाहिए कि जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठने के लिए जनादेश दिया। विपक्ष में बैठने का ये मतलब नहीं कि आप सत्तापक्ष को अपने गुंडागर्दी से या अन्य प्रकार से भय दिखाकर कोई काम करने से रोक दें। आप विपक्षी दल है, राज्य सरकार अगर गलत कर रही है, तो उसके खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने अथवा जनता को गोलबंद करने के और भी उपाय है, न कि आप गुंडागर्दी करें और किसी पर वह भी सदन में, जिसे लोकतंत्र का मंदिर कहते है, वहां आप किसी पर जानलेवा हमला करें।
कल इन्हीं बातों को लेकर, जब आपकी सदन में जाने के पूर्व जांच की जाने लगे और कल ये कह दिया जाये कि आप सदन में जूते खोल कर जाये, तो आप कहेंगे कि आपका अपमान किया जा रहा है, पर आपने स्वयं को अपमान कराने की तो सारी तैयारी कर ली, हमारे विचार से तो सारे जनप्रतिनिधियों को सदन में जाने के पूर्व हर प्रकार से जांच की जानी चाहिए ताकि उनके पास कोई ऐसी चीज न हो, जिससे वे हिंसक वारदातों को अंजाम दें...
शर्मनाक, गुंडई की हद है...
इन घटनाओं के लिए हम किसी एक दल को दोषी नहीं ठहरा सकते, ऐसा ही नजारा, उस वक्त देखने को मिला था, जब बाबू लाल मरांडी मुख्यमंत्री थे, तब तत्कालीन स्पीकर इंदर सिंह नामधारी पर भाजपा के रवीन्द्र राय ने इस प्रकार की हरकत की थी, जो अशोभनीय थी। क्या सदन इसी के लिए बना है?, ये राजनीतिक दल विचार करें, क्या वे आनेवाले पीढ़ी को यहीं आचरण करने के लिए बतायेंगे? क्योंकि ये जैसा आज बोएंगे, वैसा ही काटेंगे-कटवायेंगे?
हम चाहेंगे कि विधानसभाध्यक्ष, कल सदन में जनप्रतिनिधियों के द्वारा की गई गुंडागर्दीवाली विजूयल को जनता के समक्ष सार्वजनिक करें, ताकि लोग देख सकें कि उनके जनप्रतिनिधि जिन्हें जनता ने वोट देकर सदन में पहुंचाया, वे किस प्रकार की हरकतें कर रहे हैं? इन जनप्रतिनिधियों की संतानें और उनकी गृहिणियां भी देखें कि जिन पर उन्हें नाज है, वे कैसी हरकतें, वह भी सदन में करते हुए दिखाई देते है?
हम चाहेंगे कि विधानसभाध्यक्ष ऐसे जनप्रतिनिधियों पर ऐसी कार्रवाई करें ताकि आनेवाले समय में फिर कोई जनप्रतिनिधि इस प्रकार की गुंडई न कर सकें। जब ये जनप्रतिनिधि लोकतंत्र के मंदिर में इस प्रकार की हरकतें कर सकते है, तो वे सामान्य स्थलों पर इनकी हरकतें कैसी होती होंगी?, ये अब समझने या समझाने की जरुरत नहीं है।

Wednesday, November 23, 2016

इसे कहते है पत्रकारिता.................

आजाद सिपाही समाचार पत्र को दिल से सलाम...
जिसने यहां के बड़े-बड़े अखबारों और चैनलों की चूलें हिला दी...
जिसने एक ताकतवर नेता वर्तमान में विरोधी दल के नेता हेमंत की नींव हिला दी...
आखिर आज के अखबार में क्या है? आजाद सिपाही ने क्या कर डाला? कि हमें यह लिखना पड़ गया...
आजाद सिपाही ने प्रथम पृष्ठ पर एक लीड स्टोरी छापी है कि
“हितैषी बन कर आये थे हेमंत सोरेन, कर दिया बर्बाद – राजू उरांव”
“रुपये 10 करोड़ की जमीन ले ली मात्र रुपये 20 लाख में”
“करोड़ों की जमीन के मालिक राजू उरांव का परिवार दाने दाने को मोहताज”
“सदमें में राजू उरांव, जमीन पर सोये-सोये देखते रहते हैं आलीशान बिल्डिंग को”
“झारखण्ड आंदोलन के सिपाही थे राजू के दादा”
ऐसे है – झारखण्ड आंदोलन से उभरे नेता, दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बेटे हेमंत सोरेन। शिबू सोरेन वहीं है, जिन्होंने रिश्वत लेकर, कभी नरसिम्हाराव की सरकार बचायी थी। आज उनके बेटे अपने ही आंदोलनकारियों की जमीन पर नजर गड़ाये है, और उनकी जमीन को कौड़ियों के भाव खरीद कर, अपने सपनों को पूरा करते है और दूसरों के सपनों को इस प्रकार रौंद डालते है कि वह व्यक्ति या उसका परिवार कभी ठीक से खड़ा ही न हो सकें।
हम आपको बता दें कि इस कार्य में यहां के बड़े-बड़े माफिया पत्रकार भी शामिल है, जो ऐसे नेताओं का महिमामंडन करते और इसके बदले में उनसे उपकृत होते है। ऐसा नहीं कि इस घटना की जानकारी राज्य के स्वयं को प्रतिष्ठित कहनेवाले बड़े-बड़े मीडिया हाउसों को नहीं थी, उन्हें सब जानकारी थी, पर इन्होंने छापने का साहस नहीं किया, क्योंकि उन्हें इनसे उपकृत जो होना था।
फिलहाल राज्य में सीएनटी-एसपीटी की राजनीति चल रही है, इस राजनीति में मीडिया हाउस के लोग भी शामिल है, जो दूल्हों के भी चाची है और दूल्हिनियों के भी चाची है, पर मौके की तलाश में है कि किस तरफ ऊंट बैठे, ताकि अपनी सुविधानुसार जिस तरफ भी ऊंट बैठे, उस तरफ झक-झूमर गाने के लिए वे बैठ जाये, पर इसके उलट आजाद सिपाही ने बताया कि आखिर कौन लोग है, जो आदिवासियों के सपनों को तोड़ रहे हैं? वे कौन लोग है, जो सीएनटी-एसपीटी में हो रहे संशोधन के खिलाफ आग उगलते है, पर अपने ही भाइयों की जमीन को कौड़ियों के भाव हथिया लेते है? आज आजाद सिपाही ने ये आइना दिखाया है। ऐसा नहीं कि सीएनटी-एसपीटी पर कोई पहला संशोधन होने जा रहा था, ऐसा अब तक 26 बार हो चुका, स्वयं एक-दो बार तो शिबू सोरेन की उपस्थिति में बिहार विधानसभा में संशोधन हुआ, पर उस वक्त न तो इनके बयान आते थे, और न ही आंदोलन की धमकी सुनाई पड़ती, पर आजकल तो इनका ऐसा आंदोलन चल रहा था, जैसे लग रहा था कि इन्होंने झारखण्ड को बंधक बना लिया हो...पर जनता आज सब जान चुकी है।
मैं दावे के साथ कहता हूं कि राज्य में जितने भी चैनल है, वे सब अब पेड न्यूज के अंतर्गत समाचार प्रसारित करते है, यहीं हाल अखबारों का है, किसी को जनसरोकार से मतलब नहीं। सभी झकझूमर गाते है...जब जैसा, तब तैसा।
मेरा मानना है कि पेट के लिए अगर कोई झकझूमर गाता है तो जायज है, पर पेट से नीचे के लिए झकझूमर गाता है तो सर्वथा अनुचित है। कई अखबारों के प्रधान संपादकों से लेकर सामान्य संपादकों तक को देखता हूं कि किसी भी चिरकूट टाइप के नेता की फोन आयी नहीं कि वे झकझूमर गाने लगते है, जिस राज्य में ऐसे-ऐसे संपादक होंगे, उस राज्य की क्या हालत होगी? समझा जा सकता है...
मैं तो एक – दो चैनलों के संवाददाताओं को देख रहा हूं कि वे आइएएस-आइपीएस अधिकारियों और चिरकूट टाइप के नेताओं के आगे झकझूमर गाते है और जनसरोकार से जुड़ी समस्याओं पर ध्यान ही नहीं देते, इसका मूल कारण है कि वे अपने मालिकों और संपादकों को ये संकल्प कर चूके होते है कि वे झारखण्ड से एक साल में दो करोड़ से पांच करोड़ का विज्ञापन दिलायेंगे, और इसके लिए वे स्वयं को पत्रकार से दलाल बनने में ज्यादा रुचि दिखा रहे है, जब ये दलाल बनेंगे तो फिर हेमंत जैसे नेताओं के चरित्रों का उजागर कैसे करेंगे? आप समझ सकते है...
एक बार फिर आजाद सिपाही, आपको दिल से सलाम, आपने सही मायनों में आज बेहतर पत्रकारिता का उदाहरण पेश किया और एक व्यक्ति की गंदी सोच और गंदी हरकतों को जनता के बीच उजागर किया। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि वह व्यक्ति आज विधानसभा में एक शब्द भी नहीं बोल पाया होगा...और न वह मीडिया बोल पायी होगी, जो इनके आगे झकझूमर गाने को बेकरार होते है...

Tuesday, November 22, 2016

सचमुच देश बदल रहा है.................

सचमुच देश बदल रहा है...
जो अंधे है, वे देख रहे है...
जो बहरे है, वे सुन रहे है...
जो गूंगे है, वे बोल रहे है...
जो लंगड़े है, वे दौड़ रहे है...
जिनके पास कल तक पैसे नहीं थे...
वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए बैंकों की लाइन को कम नहीं होने दे रहे...
जिनके घर में कल तक शादी नहीं थी, वे शादी का कार्ड छपवा रहे है...
जो कल तक तत्काल टिकट के लिए लाइन में लगा करते थे, वे नोटबंदी में नोट बदलने के लिए दिमाग लगाकर पैसे बटोर रहे है...
जो कल तक खड़े नहीं हो रहे थे, वे घंटो बैंक की लाइन में, एटीएम की लाइन में खड़े होकर मुस्कुरा रहे है...
जो कल तक बीमार ही नहीॆं होते थे, आज वे बीमार भी पड़ रहे है...
भारत में इन दिनों चाहे मौत की वजह कुछ भी क्यों न हो, पर सब आजकल नोटबंदी से ही मर रहे है...
एनडीटीवी, आजतक के चैनलों के संवाददाताओं की फौज को उनके मनपसंद बाइट नहीं मिल रहे, उलटे जनता ही उन्हें निशाने पर ले रही है...
नीतीश नोटबंदी के साथ, तो लालू को मोदी की यह आइडिया फर्जिकल स्ट्राइक लग रही है...
बेइमान आईएएस और आईपीएस की टोलियों के चेहरे मुरझा रहे है...
कुछ तो एक-दो दिन की छुट्टियां लेकर, रूपयों को ठिकाने में लगे है...
दो हजारिये से नीचे बात नहीं करनेवाले डाक्टरों का दल, एक अखबार को बुलवाकर, अपना बयान छपवा रहे है...
कल तक लाल बहादुर शास्त्री के एक इशारे पर, एक बयान पर एक दिन का उपवास करनेवाली भारत की जनता में से आज कुछ देश के वर्तमान प्रधानमंत्री को एक दिन भी देने को तैयार नहीं है...
सीमा पर सैनिक मरें, पर हम देश के भीतर भी अच्छे कार्यों के लिए किसी को एक मौका देने को तैयार नहीं है...
कल तक एक दूसरे को आपस में ही देखनेवाले नेताओं का दल, वर्तमान में एक ही सुर में मोदी के खिलाफ झकझूमर गा रहे है...
सचमुच देश बदल रहा है...

Monday, November 21, 2016

वनवासी के नाम पर.............

ईसाई मिशनरियों ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत "वनवासी" शब्द पर अपनी आपत्ति दर्ज क्या करा दी? कुछ लोग वनवासी शब्द से ही चिढ़ने लगे, जबकि सच्चाई यह है कि मिशनरियों के धर्मांतरण और अनुसूचित जन जातियों के मूल धर्म से अलग करने की उनकी हरकतों की आलोचना और प्रतिकार स्वयं उसी समय के अनेक आदिवासी महापुरुषों ने किया। भगवान बिरसा मुंडा का प्रमाण सबके सामने है, पर इन दिनों देख रहा हूं कि मिशनरियों ने एक बार फिर वनवासी के नाम पर वो गंदी हरकत शुरु की है, जिससे समाज में एक बार फिर विष घुल रहा है...आखिर मिशनरियां ये विष क्यों घोल रही है, हमें लगता है कि यहां बताना जरुरी है।
इन दिनों आदिवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग मिशनरियों के धर्मांतरण के कुचक्र से लोहा ले रहा है और अपने बंधुओं को सरना धर्म में लौटने की मुहिम चला रखी है, जिससे उनके धर्मांतरण की मुहिम की हवा निकल गयी है, इसलिए वे बेतुके शब्दों के माध्यम से विष-बेली बो रहे है,ताकि समाज में नफरत की वो बुनियाद तैयार हो, जिससे मिशनरियां अपनी रोटी सेंक सकें। हमें अच्छी तरह पता है कि इसके लिए खाद - बीज कहां से उन्हें उपलब्ध हो रहा है...
और अब बात उनसे जो वनवासी शब्द पर आपत्ति दर्ज करा रहे है?
जब हम वनों में रहेंगे, तो हम भी वनवासी कहलायेंगे, इसमें दिक्कत क्या है...सिर्फ आदिवासी ही वनवासी के पर्याय नहीं है, अगर कोई ये सोचता है, तो कृपया अपने दिमाग से इस विकार को निकाल दें...सिर्फ आदिवासी को जो लोग सिर्फ वनवासी कहते है, वे मूरख ही होंगे...राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण और अपनी पत्नी के साथ 14 वर्षों तक वनों में रहे, वनवासी कहलाये। पांडव वनों में रहे, वनवासी कहलाये...एक समय था पूरा भारत वनों से ढंका था, सभी वनवासी कहलाये...आज भी जिसे हम चंपारण कहते हैं, वह चंपा और अरण्य शब्द से ही बना है, आरा अरण्य का ही अपभ्रंश है, आज भी दारुकावन, दंडकारण्य आदि कई नाम है, जो वन और वहां के वाशिदों का प्रतिनिधित्व करते है... जो आदिवासी ये सोचते है कि वनवासी सिर्फ उन्हीं के लिए बना है, तो माफ करें...मुझे भी वनवासी कहलाने में उतना ही गर्व महसूस होगा, जितना की नगरवासी या भारतवासी कहलाने में...ये तो कुछ घटियास्तर के बुद्धिजीवियों की दिमाग में उपजी घटियास्तर की मानसिक दिवालियापन है, कि इस सुंदर शब्द में भी अलगाववाद और कुत्सितविचारों का बीजारोपण कर दिये है...ईश्वर उन्हें सदबुद्धि दें ताकि वे शब्दों का सही अर्थ निकाल सकें....

Friday, November 18, 2016

हेमंत का बयान यानी हर साख पर उल्लू........

हमारे देश में एक से एक नमूने नेता है, जो अपने पप्पू टाइप सलाहकारों के इशारों पर नाचते और बयान देते है। इस नाचने और बयान देने में कभी – कभी सफलता हाथ लग जाती है तो ये नेता बौरा जाते है और कह डालते है कि अरे वाह क्या तूने हमें सलाह दिया है... हमारी तो बल्ले – बल्ले हो गयी। ये नमूने नेता ये भी नहीं सोचते कि उनका ये बयान दोयम दर्जें से भी नीचे का है। बयान देने में ये नमूने नेता ये भी नहीं देखते कि इससे सामाजिक ढांचा बिखरेगा, वे ऐसी – ऐसी हरकते करते है कि क्या कहा जाय? हम इसके लिए कोई एक दल को दोषी नहीं ठहरा सकते, इसमें सभी दोषी है।
जरा देखिये एक उदाहरण। झामुमो के नेता व वर्तमान में विरोधी दल के नेता हेमन्त सोरेन ने क्या कह दिया? हेमन्त सोरेन का विधानसभा में बयान है कि एटीएम से पैसे निकालने के दौरान मरनेवालों को सरकार शहीद का दर्जा दे। विधानसभा में इस बयान को स्पष्ट रूप से रखने के बाद, तो हमें लगता है कि हेमन्त को एक और बयान देना चाहिए कि भारत में जितने भी घूसखोर नेता है, जिन्होंने देशहित में घूस खाकर केन्द्र की सरकार बचाई, उसे भारत रत्न मिलना चाहिए, क्योंकि उन्होंने स्वयं को घूस की दांव पर बिठाकर नरसिम्हाराव की सरकार बचाई। ऐसे नेताओं को भी भारत रत्न मिलना चाहिए जो अपने बेटे, बेटियों, पत्नियों और बहूओं को सांसद, विधायक बनाने के लिए मरे रहते है।
पता नहीं, हमारे देश के नेताओं को क्या हो गया है? वे चिरकूट टाइप का बयान क्यों दे देते है?, क्या उन्हें थोड़ा सा भी दिमाग नहीं? क्या एटीएम की लाइन में लगना और सीमा पर लाइन लगाकर देश की रक्षा करना दोनों एक ही बात हो सकती है, आखिर ये नेता दोनों अलग – अलग बातों को एक ही तराजू पर क्यों तौल रहे है? नेता विरोधी दल हेमन्त के बयान ने साफ कर दिया कि झारखण्ड के नेताओं की सोच किस स्तर का है? जब नेताओं की सोच दोयम दर्जें की होगी तो ये अपने राज्य को किस दिशा में ले जायेंगे?, ये भी जगजाहिर है, यानी मान लीजिये कि हर साख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?

Wednesday, November 16, 2016

मोदी जी, मत झूकिये, इन निर्लज्जों के सामने...........

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, इन निर्लज्जों के आगे मत झूकिये, नोटबंदी जारी रखिये, भारत काला धन नामक कैंसर से स्वयं को मुक्त करना चाहता है और जब तक इस पर कड़े निर्णय नहीं लिये जायेंगे, देश इस भयानक रोग से मुक्त नहीं हो सकता। कमाल है, कल तक जो नेता भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ आंदोलन करते थे, आज आप के द्वारा काला धन के खिलाफ लिये गये निर्णय को ही कटघरे में रख रहे है और काला धन को संरक्षित करने के लिए आंदोलन पर उतारु है। एक नेता जो स्वयं को समाजवादी कहता है, उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री है, काला धन को आर्थिक मंदी से लड़नेवाला हथियार बता रहा है। राहुल गांधी की तो बात ही निराली है, वो क्या बोलता है?, क्या सोचता है?, उसे खुद मालूम नहीं। कल तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आपके द्वारा लिये गये निर्णय को साहसिक बता रहे थे, आज उनके दल आपके खिलाफ विपक्षी दलों के सुर में सुर मिला रहे है। वामपंथी पार्टियों का तो चरित्र ही रहा है कि भाजपा के खिलाफ हर बात पर आंदोलन कर देना, चाहे उसके लिए उसकी पार्टी की हवा ही क्यों न निकल जाये? इधर एक चीज और देखने को मिल रही है। कुछ चैनल और कुछ अखबार इस मुद्दे पर दो भागों में विभक्त हो गये। जीटीवी, एबीपी, इंडिया टीवी को आपके द्वारा चलाया जा रहा यह अभियान देश हित में लग रहा है, पर आजतक और एनडीटीवी जो शुरू से ही आपके विरोधी रहे है, इस अभियान के खिलाफ आग उगलने शुरु कर दिये है।
पर आम जनता की क्या राय है, वो भी देखिये आज तक का सईद अंसारी नोटबंदी पर सोमवार की रात लाइभ समाचार दिखा रहा था, समाचार में वो दिखा रहा था कि जनता को नोटबंदी के बाद से कितनी परेशानी उठानी पड़ रही है, और इसी खरखाई में वह जनता की ओर माइक लगा कर जनता से पूछ डाला, आप इस परेशानी पर क्या कहेंगे?, जनता ने कह डाला – हम मोदी के साथ है, जनता मोदी-मोदी कहकर चिल्लाने लगी, फिर क्या था?, सईद अँसारी और आजतक के होश ही उड़ गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि आम जनता को इस नोटबंदी अभियान से परेशानी हुई है, पर जनता इतनी मूर्ख भी नहीं कि इसके अंदर की बात को नहीं जानती और न समझती हो। जनता नरेन्द्र मोदी के साथ है, क्योंकि जनता जानती है कि काला धन ने देश को कितना नुकसान पहुंचाया है? कैसे ये आतंकवादियों और नक्सलियों को मदद पहुंचा रहा है?, कैसे आंतकी कश्मीर के पत्थरबाजों तक ये काला धन पहुंचाते थे?, नकली नोटों के माध्यम से। कैसे जमाखोंरों और भ्रष्ट अधिकारियों का दल काला धन के माध्यम से देश और विदेश में अपना कारोबार फैला रखा था? हमारा मानना है कि देश को आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीना है तो इस पर अंकुश लगाना ही होगा।
जरा बेशर्म नेताओं को देखिये...एक नेता कहता है कि काला धन पर अंकुश लगना चाहिए, पर समय गलत चूना गया। मैं पूछता हूं कि काला धन पर अंकुश कब लगे?, इसके लिए किसी पंडित के पास जाकर सुदिन देखना था क्या? क्या इससे काला धन रखनेवाले लोग सतर्क नहीं हो जाते? देश में जब भी काला धन पर अंकुश लगाने का निर्णय लिया जाता, समस्याएं आती, और समस्याओं से लड़ने के लिए हमें कुछ त्याग करना होगा, देश हित में। सिर्फ खाने-पीने, सुतने और बेवजह की तिरंगे लहराने को देशभक्ति नहीं कहते।
मैं तो देख रहा हूं कि काला धन पर अंकुश लगाने के निर्णय से राजनीतिज्ञों, व्यापारियों, पत्रकारों, इंजीनियरों, डाक्टरों, आइएएस, आइपीएस, सरकारी बाबूओं और उन सारे दो नंबरियों के नींद उड़ चुके है, वे पैसों को ठिकाने लगाने के लिए नये – नये तरकीब ढूंढ रहे है। जो मजदूर कल तक सब्जी के बोरे ढोते थे, जो सामान ढोते थे, जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी तबाह हुआ करती थी, जो तत्काल टिकट की बुकिंग करने के लिए रात से ही लाइन लगाने के लिए रेलवे टिकट बुकिंग काउंटर पर लगे रहते थे, उनसे रुपये बदलवाने का काम लिया जा रहा है, ये लोग बेवजह की एटीएम पर भीड़ लगा रहे है, जिनके कारण 30 प्रतिशत जरुरतमंदों को परेशानी उठानी पड़ रही है, हालांकि इन परेशानियों के बावजूद जनता मोदी की तारीफ करते नहीं थकती।
कल की ही बात है, रात में मैं एबीपी न्यूज देख रहा था, उस न्यूज में साफ दिखलाया जा रहा था कि जो लोग रात में ही एटीएम के पास पूरे परिवार के साथ खटिया और कंबल के साथ आ धमके है, वे सारे के सारे वहीं लोग है, जो काला धन को सफेद बनाने के लिए काला धन रखनेवालों की मदद कर रहे है। इनका एक ही मकसद है, काला धन रखनेवालों से मुंहमांगी रकम लो, और उनके काला धन को सफेद कर दो। हालांकि इन पर नकेल कसने के लिए केन्द्र सरकार ने स्याही लगाने का प्रबंध इनके हाथों में किया है। मैं चाहता हूं कि ऐसे लोगों को सीसीटीवी खंगाल कर, जेल में बंद भी करना चाहिए, ताकि काला धन रखनेवालों की मदद करनेवालों की नानी – दादी याद हो जाये।
हमारे देश में हर अच्छे काम करने पर उसका विरोध करना एक फैशन हो चला है। याद करिये, जब राजीव गांधी ने सरकारी कार्यालयों में कम्प्यूटर का प्रवेश कराया था, तो यहां की तत्कालीन वामपंथी और विपक्षी पार्टियों ने इसकी कितनी आलोचना की थी, इस निर्णय के खिलाफ कितना बड़ा आंदोलन चलाया था, पर आज सच्चाई क्या है?, सब के सामने है, इस कम्प्यूटर ने हमारी जिंदगी बहुत ही आसां कर दी है। ठीक इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी द्वारा लिया गया, यह निर्णय देश को मजबूती देने के लिए है। बस हमें मजबूती प्रदान करनी है, इस निर्णय की।
सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर का नरेन्द्र मोदी द्वारा लिये गये निर्णय की प्रशंसा करते हुए यह कहना कि जब हमारे फौजी, देश के जवान, विपरीत परिस्थितियों में, अपनी जान पर खेलकर देश की हिफाजत कर रहे है तो क्या हम देश के लिए इतना भी नहीं कर सकते?, आखिर दो – चार घंटे लाइन में लग गये तो क्या हो गया?, कौन सा पहाड़ टूट गया?
इस एटीएम पर लगी लाइन पर जो लोग सवालिया निशान उठा रहे है, उनसे हमारा भी सवाल है, कि आखिर हाल ही में फोकट के जियो सिम लेने के लिए लोगों ने डेढ़ किलोमीटर की लंबी लाइऩ नहीं लगाई है क्या? फिल्मों के टिकट पाने के लिए लोग लंबी लाइन नहीं लगाते क्या? और लंबी लाइन लग भी गयी तो क्या हो गया? अरे देश तुम्हारा है, देश के लिए कुछ तो करो भाई...

Thursday, November 10, 2016

माफ करिये मोदी जी................

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 500 व 1000 के नोटों पर सर्जिकल स्ट्राइक क्या चलायी, बाजार से एक, पांच, दस, बीस, पचास और 100 रुपये के नोट ही गायब हो गये। जिन्हें घर में सब्जी या जरुरत की चीजें - राशन खरीदनी है, उनके लिए जीवन - मरण का यक्ष प्रश्न आ गया है। सर्वाधिक चिंता का विषय ग्रामीण इलाकों में है, जहां स्थिति भयावह है। कल तक बैंक और पोस्टआफिस के बाबू मक्खी मारते थे, आज उनकी पौ बारह है। हर कोई उनकी आरती उतार रहा है, शायद ये बाबू भगवान बनकर कुछ मदद करा दें। एक से लेकर 100 रुपये के कुछ भी नोट का दर्शन करा दें, ताकि बनियों की दुकान पर जाकर, वे जरुरत का सामान खरीद सकें। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि कुछ दिन दिक्कते आ सकती है, शायद उनका इशारा इसी ओर था, पर हमें लगता है कि ये दिक्कतें बहुत लम्बी जायेगी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत अन्य मंत्रियों के बयान अखबारों में धमाल मचा रहे हैं। देश की जनता भी प्रसन्न है, मोदी जी ने बहुत अच्छा काम किया है। नक्सलियो से लेकर आतंकवादियों, जमाखोरों तक पर बुलडोजर चला दिया, पर जब वे बाजार जा रहे है और उनसे पूछा जा रहा है कि छोटे नोट है, तो उनके हाथ - पांव फूल जा रहे है। शायद जमाखोरों को भी पता था कि मोदी जी धमाल मचायेगे। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी धमाल में उन्होंने देश में पड़े सारे छोटे नोटों पर कुंडली मार कर बैठ गये। मोदी जी, कभी-कभी अच्छा काम से भी नुकसान होता है...
हम जानते है कि आपका हृदय साफ है, पर यकीन मानिये हमलोगों का भी हृदय साफ है। बहुतों के घर में शहनाइयां बजनेवाली है...कहीं ऐसा नहीं कि उनके घरों में मातम पसर जाये। बहुत सारी देश की महिलाएँ अपने पति से छुपाकर पैसे रखती है, ताकि आसन्न संकटों का मुकाबला किया जा सकें, यहीं नहीं वे इन पैसों से अपने पति और परिवार का मान भी रखती है, पर आज वो मजबूर होकर घर से पैसे निकाल रही है। आपने कहा था कि आप बाहर के पैसों को भारत ला्येंगे, पर आपने घर से ही उनके पैसे निकाल लिये, जिनके सपने थे। आपने बहुत अच्छा किया है, आपकी सरकार में शामिल सभी मंत्री और नेता और आपकी पार्टी दूध के धूले है, लेकिन हमारा मत है कि देश की बेटियां और मां आपके लोगों से ज्यादा ईमानदार है...उन्हें भी देश प्यारा है...वे भी आतंकियों और नक्सलियों को अपने पैरों के ठोकरों पर रखती है...पर क्या करें। वे आज दुखी है। कहीं ऐसा नहीं कि उनकी आह आपको ले डूबे...इसलिए पहले वो काम करें, जिससे इन गरीबों व महिलाओं के सम्मान पर आंच न आये...बाकी आप जो करें, देश और जनता तो आपके साथ है ही...

Monday, November 7, 2016

अल कर, बल कर, छठ पर आर्टिकल, लिख चल..........

अल कर,
बल कर,
छठ पर आर्टिकल, लिख चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर, अलबल बोल चल...
अल कर,
बल कर,
छठ पर रिपोर्टिंग कर चल,
टीवी पर अनाप-शनाप बक चल...
पिछले एक सप्ताह से हमारे आंख-कान दोनों पक गये...
अखबारों और टीवी चैनलों तथा गुगुल पुराणों ने छठ महापर्व की धज्जियां उड़ा दी है...
जितने अखबार, उतनी बुद्धि, जितने टीवी उतनी बक-बक
और सभी ने अपने ज्ञान से छठ की ऐसी-तैसी कर दी...
जिनको छठ के बारे में एबीसीडी नहीं मालूम
वे महाज्ञानी और महापंडित बनकर उपदेश देते नजर आये
और
जो छठ के सर्वज्ञानी है, वे अपने कमरों में बंद होकर पागलों जैसा बुदबुदाते नजर आये...
मैं पिछले एक सप्ताह से देख रहा हूं कि अखबारों और टीवी चैनलों में नये- नये चिरकुटानन्दों की फौज ने धमाल मचा रखा है...
बंदरों जैसी हरकते, गधों जैसी सोच रखे, रिपोर्टरों और अखबार व चैनल के संपादकों ने छठव्रतियों और उनके परिवारों का कीमा बना दिया है...
सच पूछिये, अगर जो नये ढंग से छठ से जुड़ना चाहते है, तो उनके लिए इन महाचिरकुटानंदों ने हर प्रकार के कुसंग से छठ का नाता जोड़ दिया है...
जबकि पूर्व में ऐसा नहीं था...
बच्चे अपनी मां और दादी से छठ की आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को जान लेते...
कल की ही बात है...
एक अखबार और उसके बाद चैनल पर हमारी नजर गयी...
जनाब एक सज्जन, छठि मइया को भगवान भास्कर का पत्नी बता दिये...
एक ने बहन बना दिया
और एक ने क्या कह दिया, उसे खुद पता नहीं...
यहीं नहीं
आजकल वामपंथियों की एक नई फौज जो धर्म को अफीम मानती है, वह भी छठ में साम्यवाद ढुंढती नजर आयी, उन वामपंथियों को छठ के ठेकुएं और केले में कैसे साम्यवाद नजर आ गया, हमारी समझ से परे है...
चोरी से, चीटिंग से मैट्रिक, इंटर, बीए, एमए कर किसी तरह से प्रोफेसर और रीडर बने लंपटों का समूह भी छठ पर आर्टिकल लिख रहा था और उसे अखबार वाले इस कदर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे थे, जैसे लग रहा हो, कि वह महाज्ञानी हो...पर जो लोग छठ के बारे में विस्तृत जानकारी रखते है, उन्हें ये पता लगते देर नहीं लगी कि ये ढोंगी प्रोफेसर चोरी से डिग्री लेकर यहां तक पहुंचा है, जो सारी दुनियां को भरमा रहा है, और इसके माध्यम से संपादकों का समूह अपनी उल्लू सीधी कर रहा है...
यहीं हाल सारे चैनलों के रिपोर्टरों का था...
चूंकि छठ के बारे में नॉलेज तो है नहीं तो बस घिसी पिटी सवाल से फिल्मों में काम करनेवाले असरानी, जगदीप, राजेंद्रनाथ और धूमल जैसे हास्य कलाकारों का रोल अदा कर रहे थे और यहीं हाल टीवी के एंकरों का था...
इन सारी हरकतों को देख, हमें ये जानते देर नहीं लगी कि आनेवाला समय महामूर्खों चिरकूटानंदों का है...यानी जो जितना मूर्ख वो उतना ज्ञानी...जितना अल बल लिखो, उतना बड़ा साहित्यकार और पत्रकार...
पर इसके परे,
एक परिवार को भी देखा...
बुढ़ी माता...छठ कर रही थी...
उनके संग, बहुत सारी औरते थीं, जो बुढ़ी माता को सहयोग कर रही थी...
बच्चे बुढ़ी माता को आजी कहकर पुकार रहे थे...
तभी मैं रह नहीं पाया...
पूछ डाला कि आजी आप अखबार पढ़ती है, टीवी देखती है...
आजी ने कहा – ए बचवा, आग लागे अइसन पढ़ाई के

आउर आग लागे अइसन टीवी दिखाई के
अरे जब भावे नइखे, तो पूजा करके का होई...
हमरा कोई सीखवले बा...
अरे हम अपना घर में बुढ़ परनिया के देखनी और सीख गइनी...
इ तो अखबरवन और टीवीवालन सब बर्बाद करके धर देले बारन सब...
हम तो सोचतानी कि अइसने चलत रही...
त आगे चलके
भीड़ त दीखी पर छठि मइया ना दिखाई दीहे...